गुरुवार, 15 जून 2017

भाजपा का उपवास, कांग्रेस का सत्याग्रह और रावण का चयन







(संदर्भ: मप्र में किसान आंदोलन व हत्याकांड )

     यदि भीड़तंत्र को पैमाना माना जाए तो बुधवार का दिन कांग्रेस के लिए भाजपा के “उपवास” उपक्रम की तुलना में सफल दिखाई दिया। प्रदेश में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी व  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के दो करोड़ से ऊपर के व्यय वाले  डेढ़ दिवसीय उपवास आयोजन में तुलनात्मक रूप से भीड़ कम होना एक बड़ा इशारा है।

   आगामी वर्ष में चुनाव के चलते प्रदेश की राजनीति में हलचल शुरू हो गयी है। इसी तारतम्यता में भीड़ आधारित भव्य आयोजनों का  दिलचस्प पहलू यह है कि दोनों आयोजन विपरीत दिशा में स्थित दशहरा मैदानों में हुए। कर्ज और समस्याओं से घिरे सात माटी पुत्रों की हत्या और किसानों की समस्या के प्लॉट पर यह राजनीति गर्मायी हुई है। एक तरफ किसान पुत्र की छवि बनाये हुए सीएम शिवराज किसान आंदोलन और इस दौरान पुलिस फायरिंग में हुई हत्याओं के दोष कांग्रेस और अराजक तत्वों पर मढ़ रहे हैं, आयोग गठित कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पूरा ठीकरा भाजपा शाषित केंद्र और प्रदेश सरकार पर फोड़ रही। यानि किसान को केंद्र में लेकर समस्त राग हर सुर में आलापे जा रहे हैं।यह तय है कि नारों और आरोपों के आरोह पर भीड़ रूपी श्रोता का मंत्र मुग्ध होना वोट के ग्राफ को बढ़ाएगा या गिरायेगा।
   दोनों आयोजनों में एक रोचक पहलू खेमेबाजी का भी  सामने आया है। भाजपा में जहां सभी बड़े चेहरों में एकजुटता दिखाई देती है वह धरातल पर स्तिथि स्पष्ट कर जाती है। मंच पर सब दिखते हैं अपने रिपोर्ट कार्ड और नम्बरों के लिए पर उनके लापता समर्थक सारी स्तिथि बयां कर जाते हैं। पार्टी के बड़े कद के नेता दबी जुबान से सीएम चौहान का विभागीय योजनाओं के कार्यक्रम में माइलेज लेने से नाराजगी उपजने की बात कहते हैं। इसका परिणाम साथ दिखने के बावजूद साथ नहीं होने के रूप में सामने आ रहा है। यही सीएम के उपवास कार्यक्रम ने नज़र आया। वहीं कांग्रेस में अपने-अपने खेमे के साथ झंडा बुलंद करने में अलग दिखने वाले प्रमुख नेताओं से भरा मंच उनकी एकजुटता भी दिखा गया। इस एकजुटता का प्रमाण वहां आकर्षित हुई, बुलवाई गयी या शक्ति प्रदर्शन के लिए हर खेमे के लिए आई भीड़ ने दिया।
  आगामी वर्ष 2018 के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों दलों ने शहर के महत्वपूर्ण दशहरा मैदानों से मोर्चे खोलेने का अनुष्ठान सम्पन्न कर लिया है। यह वही दशहरा मैदान हैं जहां साल में एक बार रावण जलता है तो जनता अच्छाई पर बुराई की जीत का जश्न मानती है।      
    फिलहाल दोनों ओर से मैं अच्छा- तू बुरा का द्वंद शुरू है। इस द्वंद में राम रूपी जनता अपने वोट रूपी अस्त्र से रावण और राम का चयन करेगी। चलते-चलते एक सत्य यह भी की रावण दहन पश्चात लगने वाले मेले में उत्साह तो होता है पर जेबकट और ठग अपना खेल दिखा ही देते हैं।
(चित्र: सीएम शिवराज के उपवास व कांग्रेस के सत्याग्रह के आयोजन स्थल के मंच व मौजूद समर्थक)


रविवार, 11 जून 2017

सरकारी चिकित्सक क्या विलुप्त हो जाएंगे?


(संदर्भ: जिले के चिकित्सक की प्रताड़ना कथा)
     कल एक चिकित्सक से बात हुई। वे मध्यप्रदेश शासन के अधीन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ हैं। एमपीपीएससी परीक्षा द्वारा इनका चयन हुआ था। अब वे इस्तीफा दे रहें हैं।
    चिकित्सक महोदय को पदस्थापना राजधानी से सटे जिले में मिली। यह जिला पूरी तरह एक वरिष्ठ नेता और  विधायक (कैबिनेट मिनिस्टर) के इतने प्रभाव और दहशत में माना जाता है कि सब इसके केंद्र यानि दिल्ली से संचालित होने की बात कहते हैं। यानि प्रदेश शासन का न के बराबर काबू। चिकित्सक महोदय से मिला तो चेहरा बेनूर, चिंता में घिरा और अवसाद ग्रस्त दिखा। कुरेदने पर जो सुना उससे दुख हुआ। वे इस्तीफा दे रहे हैं। कारण स्वास्थ्य विभाग में चापलूसी से चपरासी बाप बनता है। मंत्री जी की सगी रिश्तेदार महिलाएं विभाग में हैं और जिले में ही पदस्थ हैं। एक सेवानिवृत्त हो गईं हैं। सिवाय चपरासी की किसी की नहीं सुनतीं । तमाम असुविधाओं के साथ ग्रामीण इलाके में सेवा दे रहे चिकित्सक महोदय फालतू की जलालत- मलालत से आज़िज़ आ गए। जितने बार आवेदन दिया ट्रांसफर का, तकलीफ बतायी उतनी बार ही प्रताड़ना बढ़ती गयी। जब स्वाभिमान के आगे सहन नहीं हुआ तो इस्तीफा लिख लिया। और सौंपने का पूरा मन भी बना लिया। ठान लिया है कि इस्तीफा दे भी देंगे। एक वरिष्ठ पत्रकार से चर्चा की तो उन्होंने एक कम्पाउण्डर का किस्सा सुना दिया। बताया कि उसे भी इसी जिले में इसी तरह प्रताड़ित किया। बर्खास्त किया। सब जगह से जीता पर नौकरी नहीं चढ़ पाया। ऐसे अनेकों किस्से आपको संचालनालय के गलियारों में सुनने मिल जाएंगे। 
   अब सवाल यह है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शासन में चिकित्सकों की इस हालत का असर किस पर पड़ता है? प्रशासनिक स्तर पर योजनाओं पर बड़ी-बड़ी बातें और हकीकत एकदम उलट। क्या प्रदेश से सरकारी चिकित्सक एक दिन विलुप्त हो जाएंगे? क्या इस तरह सरकारी चिकित्सा सेवा के निजी हाथों में जाने की ज़मीन तैयार नहीं हो रही है? प्रदेश में सरकारी चिकित्सकों को टोटा नहीं है क्या? यदि हां, तो आप और आपका विभाग सकारात्मक माहौल बनाने में असफल क्यों है? वीआरएस लेने वाले सरकारी चिकित्सकों किस संख्या नियंत्रण में क्यों नहीं है?  क्या चिकित्सा अधिकारियों व कर्मचारियों की हड़ताल या आंदोलन के बाद आप फिर उपवास रखेंगे?

मंगलवार, 30 मई 2017

विमुखीकरण....


                                                            (प्रसंग- हिंदी पत्रकारिता दिवस)

       कोई तो है जो नकार दिया जाता है। कोई तो है जिसकी आवाज़ कानों तक पहुंचती है, अन्तस् को झकझोरती है। कोई तो है जो आपके बीच मौजूद है और सब निहार रहा है, पुकार रहा है। शायद सचेत कर रहा है। कोई तो है जो असत्य, झूठे वादों, अधूरे सपनों, छल-कपट, हिंसा, द्वेष, क्षोभ, परनिंदा, कुंठा से भरे मृगमरीचिका समान अलौकिकता का एहसास कराती चकाचौंध से दूरी के लिए चेताता है। कोई तो है जो त्याग देता है ऐसी चकाचौंध और एक अंधियारे पक्ष को अपनी पीठ पर पाल लेता है। कोई तो है जिसकी अंतरात्मा अपेक्षा की पीड़ा से तिल-तिल मरती है और शुभ कामनाओं से भरे रहने के चलते जीवित रहती है। वो कौन है जो कहता है आगे बढ़, पर संभलकर, गति पर नियंत्रण सहित।
     उसकी पीठ पर गिद्धों की चोंच के निशान हैं। वह विमुखीकरण का मारा है। वही विमुखीकरण जो समाज के पीठ दिखाने से उपजा। अब गिद्ध ही उसके स्वामी हैं और वह उसका बंधुआ। वह नोचा ज्यादा जाता है। वह कुपोषित हो चुका है। वह मरेगा नहीं क्योंकि गिद्ध उसे जिंदा रहने लायक निवाला देते हैं।वह निवाला स्वीकारता है। वह मरना भी नहीं चाहता ताकि वो कहीं से आवाज़ दे सके तुम्हें। गिद्धों के खिलाफ। गिद्धों को भी निवाला देते हुए।
प्रसंगवश: सनद रहे कि जिस 'उद्दंत मार्तण्ड' के प्रकाशन के चलते हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है, वह मात्र डेढ़ साल में ही बंद हो गया। पंडित श्री जुगल किशोर शुक्ल जी ने इसका खर्च व्यय करने की असमर्थता के चलते इसके प्रकाशन को विराम दे दिया था। तब शायद सरकार ज्यादा अडिग और पत्रकार ज्यादा निडर व स्वाभिमानी थे
हिंदी पत्रकारिता दिवस की अशेष व विशेष शुभकामनाएं।

बुधवार, 20 नवंबर 2013

                               दम्भित सत्ताधीश, भटका विपक्ष और चुनाव !
                             

मध्यप्रदेश में चुनावी दंगल और सत्ता पर काबिज़ होने की होड़ इस तरह से हावी है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों के विज्ञापनों से एक दूसरे की छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। चुनावी रणभेरियों में आम जन से लूट मचाने में कौन ज्यादा सफल रहा का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है।
 जहां एक  ओर शिवराज माटीपुत्र किसान के हितैषी होने का दम्भ भरते हैं वहीँ प्रदेश कांग्रेस आदिवासियों के हित की बात कहती है। शिवराज जहां अपने ही दल के एक वरिष्ठ नेता द्वारा जहां उन्हें ''घोषणावीर" का तमगा दिया गया तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश किसान संघ द्वारा अपने घर में ही घेर दिए गए। दिसंबर 2010 में किसान संघ अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा ने लगभग 4000 ट्रेक्टर-ट्रॉलियों के साथ विराट घेराव-प्रदर्शन किया था।  किसान शिवराज के सात साल के शासन में किये वादे पूरे ना होने पर क्रोधित हो पूरे प्रदेश से राजधानी को बंधक बनाने चले आये थे।इसमें  एक किसान लाठीचार्ज व गोलीबारी में काल के गाल में समा गया।
 वहीँ कांग्रेस की स्तिथि देखें तो पाएंगे कि शिवराज से पहले राज कर रहे दिग्विजय सिंह को कर्मचारियों के क्रोध का सामना करना पड़ा था। दैनिक वेतन भोगियों की नौकरी लीलने के साथ घाटे के नाम पर निगम-मंडल बंद करने से उपजे रोष ने ना सिर्फ दिग्विजय सिंह को कुर्सी से उतार दिया बल्कि दस वर्ष तक पद मोह को त्यागने की  शपथ लेने पर भी मजबूर कर दिया था।  ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर न पड़ने देते हुए मोर्चा सम्भाला स्व. जमुना देवी ने।  "बुआ" सम्बोधन से प्रसिद्ध रहीं जमुना देवी ने जमकर सरकार के कान उमेठे। डम्फर काण्ड को लेकर जिस तरह से उन्होंने मोर्चा लिया वह किसी से छुपा नहीं था। प्रदेश की पूर्व उप-मुख्यमंत्री, लोक सभा, राज्यसभा  सदस्या रहीं बुआजी कि छवि  महिलाओं, दमित-शोषित व आदिवासियों की आवाज़ उठाने वाले की रही। प्रदेश की ज़मीनी व कद्दावर नेता रही जमुना देवी के सितम्बर 2010 में देहावसान से भाजपा को फायदा पहुंचा। प्रदेश स्तर पर आंतरिक रूप से गुटों व धड़ों में बंटी कांग्रेस की मुद्दों पर पकड़ ढीली पड़ गयी।  राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर क्षतिग्रस्त होती कांग्रेस की छवि प्रदेश में भी कहीं न कहीं अपना प्रभाव दिखा गयी।
अक्सर देखा जाता है कि विकास की कहानी ज़मीन और सरकारी पन्नों पर अलग ही बयाँ होती है। जहाँ आदिवासी आज भी दयनीय स्तिथि में है तो वहीँ किसान भी खुश नहीं हैं।एक तरफ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया आदिवासियों की दमदार पैरवी करने में असफल रहे तो दूसरी ओर अपने दल में भी कोई खम्ब नहीं ठोक पाये।  आंतरिक रूप से विखंडित प्रदेश कांग्रेस ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई है।  दो विधानसभा कार्यकाल में शिवराज व उनके विधायकों ने कई आरोपों का सामना किया।  कमजोर पड़े विपक्ष ने शिवराज को कई दफा अभयदान प्राप्त होने दिया।
प्रदेश में चुनावी घमासान भले ही बागियों और भितरघातियों ने रोचक बना दिया हो, पर जनता के असल मुद्दे कब सुलझेंगे यह प्रश्न अब भी गम्भीरता लिए हर मोड़ पर खड़ा है।  दावे और वादे से इतर आम जन की एक आस और गुहार भी है कि उसके दिन बदलें।  आमजन चाहता है कि हित की  बात करके सरकार बनाने वाले वास्तव में कुछ सुखद बदलाव भी कर दिखाए, चाहे सरकार किसी की भी आये।


शनिवार, 12 जनवरी 2013

"बड़ी अम्मा",शेरों की शिकारी और एक फूल की दास्ताँ

                                                                      -RAHUL CHOUKSEY
दो पड़ोसी थे। दोनों के अधिकार क्षेत्र का निर्धारण बाड़ से होता था। अमूमन दोनों के घर के अन्दर होने वाले झगड़े की गूँज एक-दूसरे को सुनाई देती थी।बर्तन भी गिरता तो खनक से पहचान जाते कि दूसरे के यहाँ क्या हुआ। कारण कि कभी दोनों के चूल्हे एक थे।एक घर बड़ा था,तो दूसरा छोटा।दोनों की रियाया के रहनुमा एक सरीखे 
   बड़े घर की मुखिया ''बड़ी अम्मा'' को शान्ति पसंद न थी, पर वे खुद और उनके खिदमतगार बड़े शांत रहते थे। कहते है ''बड़ी अम्मा '' के पास बड़ी रियाया थी,पर उस रियाया के लिए रियायत बिलकुल नहीं। लगान से त्रस्त पर आश्वासनों से जीवटता बरकरार रखती रियाया विधवा "बड़ी अम्मा" के प्रति रूढ़िगत संस्कारों के चलते आस्था बनाए रखती थी। "बड़ी अम्मा" का प्रवेश इस घर में पिछले रास्ते से हुआ था। कहते है "बड़ी अम्मा" ससुराल से चोरी छिपे माल ढोकर अपने मायके में रख आती थी। "बड़ी अम्मा के बच्चे" अपने ननिहाल से बड़ा लगाव रखते थे। वे भी इस माल ढुलाई में अपनी माँ की भरपूर मदद करते। जब भी रियाया जवाब मांगती,"वे" "बड़ी अम्मा के आँचल" में छिप जाते। "लाचार रियाया" जब भी रिरयाती-गरजती-आँखें तरेरती तब "बड़ी अम्मा" के खिदमतगार नाना प्रकार के स्वांग रचते और थाली से रोटी,चूल्हे से लकड़ी और तन से कपड़े छीन लेते। रियाया मन मसोस कर नंगे पैर पथरीले रास्ते वापिस लौट जाती। जनता "मुनादी करने वालों" को बहुत विश्वास और इज्ज़त की नज़रों से देखती थी।विश्वास और हमदर्दी की नज़रों से इसलिए इन मुनादी पीटने वालों के पूर्वजों के शोर से पनपे जोर ने घर पर राज करने के बाद "दो टुकड़े" करने वालों को खदेड़ दिया था। रियाया को यकीन के साथ संदेह है कि ये मुनादी वालों  को  "बड़ी अम्मा" ने टुकड़े-टुकड़े कर टुकड़ों में खरीद लिया है। रियाया कहती है कि "मुए मुनादी वाले'' कान में शोर किए रहते है।
   एक रोज ''एक फूल सी बिटिया'' छाँव न मिल पाने के कारण "ताप" से मुरझा गयी।"क्षरण" से "पतित" हो वह जब अलविदा हो रही थी, एकाएक ''महक'' उठी। उसकी निर्जीव किन्तु तेजस्वी काया ऐसी महकी कि जनता बेचैन हो उठी।"महक" से एकजुट हुई रियाया "छाँव की गुहार" ले अपनी फुलवारियों को रक्षा देने की मांग करने लगी।  "बड़ी अम्मा" और "खिदमतगार" अबकी बार मामले की गंभीरता भांप चुके थे।मुनादी वाले भी अब चोंगे उपयोग में लाने लगे थे। स्वाभाविक है आवाज़ ज़ोरदार हो चुकी थी,किन्तु गला अभी भी फाड़ना पड़ता था। बड़ी अम्मा और खिदमतगार आश्चर्यचकित थे कि जो कलियाँ 'गजरा' बना बंद कमरों में जबरन रौंदी जाती थी,उसको राह चलते कैसे कुचल दिया गया? खैर बड़ी अम्मा और खिदमतगारों की खैरियत इसी में थी के वे चार दीवारी के पीछे से शोर सुने। मुनादी से चोंगे वालों में तब्दील मुलाज़िमों को हुक्म जारी हुआ कि  बहुत हुई ऐश,अपनी मोटी चमड़ी ले भीड़ में उतरो। साथ ही निर्देश जारी हुए की वहीँ से चोंगे पर चिल्ला जानकारी देना। जनता को भी लगेगा की तुम्हारे अन्दर पूर्वजों की ईमानदारी,स्वाभिमान,आत्म-सम्मान जिंदा है।साथ ही चेतावनी भी जारी कर दी गयी कि ज्यादा जोर लगाकर भी न चिल्लाएं।बड़ी अम्मा ने बड़ी ही मासूमियत से इसका कारण बताया की वे सिर्फ गूंगे बनने का ढोंग करते है, बहरे होने का नहीं।अगले पल चोंगे चीख पड़े चीत्कार-पुकार-हाहाकार की सूचना के साथ। दिन में एक बार चोंगा भीड़ के बीचों से चिल्लाता तो चार बार बड़ी अम्मा के चौखट से।
पर इस बार छद्म आश्वासन भारी पड़ने और बढ़ने के साथ जनता का गुस्सा भी बढ़ते जा रहा था। बड़ी अम्मा और खिदमतगारों ने आपस में सलाह कर चोंगों पर एलान करवा दिया की निर्जीव किन्तु महक चुकी"फूल सी बिटिया" को जादूगर माली के पास दूसरी बगिया में भेज जीवन दिया जाएगा। शीघ्र ही सुबकती रियाया एक आस के साथ उस फूल सी बिटिया को आसमान में उछलता देख रही थी।शायद किसी दैवीय चमत्कार की आस में। जब जादुई माली ने हाथ खड़े कर दिए, तब वह  फिर आसमान में फिर उछाल दी गयी। 'एक सामूहिक मृत आस' के साथ वह अपनी जड़ों की मिट्टी में हमेशा के लिए पनाह लेने लौटी। पर बड़ी अम्मा और खिदमतगार उस फूल के जड़ों में समाहित होने के पश्चात् उत्पन्न होने वाले कम्पन व परिणाम को भांप चुके थे। लिहाजा मखमल की थाल पर जादुई माली के पाले से उछाली गयी निर्जीव फूल सी बिटिया को जकड़ा गया। जिस क्रूर ताप से वह मुरझाई थी लगभग उतनी ही तपिश से उसकी जड़ों को भी सेंका गया। इस दौरान चोंगे वाले जनता के क्रोध के राग को भावनाओं की स्वर लहरियां देते रहे।रियाया अब रिरिया नहीं रही थी, अपितु गरज रही थी। फिर बैठक हुई अम्मा और खिदमतगारों के बीच। सभी ने हमेशा की तरह ध्वनिमत दिया "ठीक है-ठीक है"।गोपनीय बैठक को नपे-तुले शब्दों के साथ खुले में मंचित किया गया।  चोंगे चीखे तो जनता फिर कराह उठी। अभी आत्मा पर पड़ी चोट का दर्द मिटा भी न था कि  "महंगाई" का चाबुक फिर लहुलुहान कर गया। बड़ी अम्मा अब नुकीली छड़ी ले एक-एक कर वार करने लगी। कोल्हू के बैल सरीखा जनता का हाल हो चुका था। तभी एकाएक चोंगा फिर चहका।चिल्लाया की बाड़ पर उस पार नज़र गाड़े दो शेर मर गए है। दोनों में दहाड़ में जोर था। चोंगे वाले भागे बाड़ की तरफ। फिर लगभग मुनादी वाले अंदाज़ में कहा कि बाड़ पार के शिकारियों ने शिकार किया है।शेर जिस बाड़े में पले-बढ़े थे,वहां मातम पसर गया। चोंगे वाले फिर मातम की शेहनाई बजाने लगे। चूँकि शेर मरे थे तो मातम में व्यापत अदृश्य जोश रगों में महसूस हुआ। फूल सी बिटिया की बलि के बाद शेरों की शहादत।फ़र्क इतना की शिकारी इस दफ़ा सालों पहले जुदा हुआ हमसाया ही है। और फूल को तोड़ने-मरोड़ने-कुचलने वाले घर के ही बिगडैल।वही जहां एक तरफ घर में अंधी-बूढ़ी पर कठोर कही जाने वाली नानी इन कपूतों के कान मरोड़ने लगी, तो दूसरी तरफ लहूलुहान-फटेहाल जनता 'शेरों के शिकारियों' के 'शिकार' की बात करने लगी ।
    क्रूर विधवा "बड़ी अम्मा" ने अपने खिदमतगारों के साथ लहूलुहान-फटेहाल जनता पर फिर गिद्ध-दृष्टी बना ली गयी।मांस नोचने की प्रक्रिया को शीघ्र अंजाम देने की तैयारी शुरू कर दी गयी। चोंगे से फिर ऐलान हुआ सालाना विधिवत डकैती का। रियाया फिर रोई , पर नए सितम पर। वो सितम जो घर को बांटने वाले,  ज़ुल्म ढाने वाले विरासत में दे गए थे।
   कहते है अम्मा के पास "जादुई कठपुतली" है।हु-ब-हु इंसान।भयंकर 'असरदार' व वफादार।ऐसा कहा जाता है कि ये कठपुतली सिर्फ बड़ी अम्मा से बात करती है। बाहर से आये मेहमानों का मनोरंजन भी करती है।एक रात अम्मा कठपुतली से बात कर रहीं थीं।कठपुतली से कह रही थी की देखा "मौन की शक्ति" को। देखा इन गुलामों का हश्र। बड़े चले थे हमारी ज़मीन सरकाने।अरे मूर्ख हैं ये सब। अगर घर के घर में आंगन उजाड़ने वाले मौजूद हो,तो क्या अपने शेरों का शिकार करने वाले मौजूद नहीं हो सकते। सुनो कठपुतली, ये जनता टोटके बहुत मानती है।अगर किसी का उसके पड़ोसी से झगड़ा लगाना हो तो काले कपड़े वाला सिर कटा पुतला और कटा निम्बू सिन्दूर लगा उसके आँगन पटक दो सुई चुभोकर।  हमने भी यही करा है। बस पुतला अपनों को बना अपने आँगन में ही पटक दिया। सुइयां आवाम को चुभन देते रहेंगी। और सुनो कठपुतली, जल्द ही प्रधान साहब आ रहे है इस मसले को सुलझाने तुम बस "ठीक है" कह देना। इसके बाद अम्मा अपने नन्हे-मुन्नों को माल बनाने-समेटने और पकड़े जाने पर चोंगों की मदद से,महंगाई की चाबुक से और मौकापरस्त हो रियाया का ध्यान हटाने का पाठ पढ़ाने लगी।
नोट: इस रचना का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का उपयोग करना मात्र है।रचना पूर्णतः काल्पनिक है। किसी भी घटना अथवा जीवित एवं मृत पात्र से मेल मात्र एक संयोग माना जाएगा। 

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

''अपना '' है मेरा सपना


भाषा की गोद में,
सत्य के शोध में,
विचारों के गतिरोध में,
पलता है मेरा सपना .

आशाओं की डोर से ,
उम्मीदों की भोर से,
निष्ठा के जोर से,
अठखेलियाँ करता है मेरा सपना.

निर्विकार-निराकार संसार से,
जोश के उदगार से ,
निर्मल व्यवहार से
अपनों से ज्यादा ''अपना '' है मेरा सपना

सोमवार, 19 सितंबर 2011

जिस राह का मैं पथिक


जिस राह का मैं पथिक
विचलित -भ्रमित मैं नहीं तनिक
अगर-मगर की बहुत निकली डगर
न क़दमों में कम्पन ,मैं चला निर्भीक

थामा है दामन सच का
प्रहारों से मैं न बिचका
यज्ञ है यह उन आह्वानो का
ऋणी रहा हूँ बचपन से जिनका

आहुति कुंड की लपटों से मेरे
लालिमा लिया नभ है घेरे
शंखनाद बलिदान का वहां हैं फूंका
माया -लोभ के जहां डले हैं डेरे

शिशु से शिथिल अवस्था तक की दूरी
समय लगे बिन देर होती है पूरी
कहत करत चल बसे सयाने
सतकर्म गति बिन अधूरी जीवन धुरी

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

ईमान


दुनिया का दस्तूर है

बेईमान बेक़सूर है

ईमान बिकता है दर दर

न बेचने वाला जलता ज़रूर है

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

रिश्ता


फिज़ा वो
बदरा मैं
बरसा मैं
महका वो

चिराग वो
रोशनी मैं
बिखरा मैं
निखरा वो

ज़मीं मैं
फ़लक वो
उतरा वो
भीगा मैं

गरजा वो
गुज़रा मैं
गुज़रा मैं
बिखरा(तड़पा ) वो .........

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कशमकश


कशमकश में ना जाने कितने कश उड़े,
चार कदम बहककर घर को ही मुड़े।
चार चिरागों ने दिखाई थी लौटते वक्त रोशनी,
चली जो आंधी, वही आशियां खाक होने तक उजड़े।।

एक चक्की के दो पाट



एक चक्की के है दो पाट,
अमीर पलंग तो गरीब है खाट ।
एक की सूखी चमड़ी तो एक के है ठाठ,
एक निकाले दमड़ी तो दूजा करे पैसों का पाठ।।

दाने-दाने को तरसे है एक,
पके-पकाए को दूसरा देता फेंक।
एक बहाता पसीना बिन देखे शीत और जेठ,
एक बहाता पसीना अंदर करने को पेट।।


दाना प्रेम का डालिए तो,
हटा तिरस्कार की भावना ।
दूरी धन की लकीर की पाटिए तो,
देख अद्भुत प्रेम-सागर की संभावना।।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011


इस शहर को फिर बसाने एक तरकीब चाहिए ,
इंसां को इंसां से फिर मिलाने एक तहज़ीब चाहिए।
उड़ चला है जो परिंदा नया आशियाना बसाने के लिए,
लौटा लाए वापिस उसे नीड़ की ओर,एक ऐसी डोर चाहिए।।

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

न्याय के मंदिर में हमलावर युवा

तीस वर्षीय उत्सव शर्मा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से फाइन आर्ट्स में अव्वल दर्जे से उत्तीर्ण व एन आई ऍफ़ डी अहमदाबाद में अध्यनरत वह युवा है जिसकी पहचान एक हमलावर की बन गयी है।उत्सव फिर से ब्रेकिंग न्यूज़ बना ।इस बार उसने गंडासे से तलवार पर हमला करा ।इससे पहले उत्सव ने आई पी एस राठौर पर भी हमला किया था । विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि उत्सव के कोप के भाजन किशोरियों के प्रति अपराध के आरोपों के कटघरे में है।
आज का युवा अपना मन टटोले और खुद से यह सवाल पूछे कि क्या उत्सव ने वही किया जो हमारे मन में प्रथम विचार आता है रुचिका और आरुषि के आरोपियों के प्रति ? क्या उत्सव वास्तव में मनोरोगी है? यदि हां तो जिम्मेदार कौन है उत्सव के मनोरोगी होने का ? क्योंकि उत्सव आदतन अपराधी नहीं है और न ही वह राह चलते को मारता है । गौरतलब है की उत्सव के माता- पिता स्वयं अति पवित्र धर्म 'शिक्षा' के क्षेत्र में है । वे दोनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है। पिताजी विश्वविद्यालय में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर है और माताजी मनोचिकित्सक व प्रोफेसर दोनों । यदि संस्कारो और शिक्षा की बात की जाए तो उत्सव का पालन , पोषण व शिक्षण कही ज्यादा बौद्धिक माहौल में हुआ है ।बेशक उत्सव का कदम दुस्साहस की श्रेणी में आता हो पर सच यह भी है अभी कई उत्सव सामने आना बाकी है। बुज़ुर्ग एवं भ्रष्ट राजनेताओं के हाथों सत्ता हो और लालफीताशाही चरम पर अपने ज्ञान के बल पर देश को चरमरा रही हो तो युवा प्रतिशोध व रोष कैसे दर्शायेगा ? यदि उत्सव ने गलत किया है तो हमें (युवाओं को) देश के दोबारा गुलाम होने का इंतज़ार करना होगा ताकि हम भी क्रांति की चिंगारी की गर्माहट सबको महसूस करा सके । किन्तु यह अब मुमकिन नहीं क्योंकि अब हम गुलाम ढिंढोरा पीट कर नहीं बनाये जायेंगे । विश्वगुरु भारत मानसिक गुलाम बनाया जा रहा है । संस्कृति पर हमले हो रहे । पाश्चात्य संस्कृति हावी हो चुकी है। लोकतंत्र के तीनों खम्बो को कोसना कथित चौथे खम्बे के लिए ब्रह्मपाप समान हो चूका है , क्योंकि भ्रष्टाचार रुपी रक्त तीनों खम्बो से निकल चौथे की रगों में प्रवाहित हो चला है। इन सब से तिलमिलाता युवा अपना 'उत्सव' तलाश ही लेता है। रुचिका व आरुषि के लिए शान्ति से प्रदर्शन हुए ,किसके कान में जू रेंगी ? उत्सव ने थोडा चोंगा (मीडिया) का उपयोग किया सब हिल गए। कई जगह उल्लेख हो चूका है इस पंक्ति का फिर भी मुझे इसे उद्धृत करने में सहूलियत ही महसूस होगी। पंक्ति कुछ इस प्रकार है ... ''भगत सिंह की फांसी पर गाँधी कुछ नहीं कहते..कहते तो भगत भारत आज़ाद कर ले जाते..." अब हमे ही सोचना होगा की आज का युवा भगत बने या गोडसे।