(संदर्भ: जिले के चिकित्सक की प्रताड़ना कथा)
कल एक चिकित्सक से बात हुई। वे मध्यप्रदेश शासन के अधीन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ हैं। एमपीपीएससी परीक्षा द्वारा इनका चयन हुआ था। अब वे इस्तीफा दे रहें हैं।
चिकित्सक महोदय को पदस्थापना राजधानी से सटे जिले में मिली। यह जिला पूरी तरह एक वरिष्ठ नेता और विधायक (कैबिनेट मिनिस्टर) के इतने प्रभाव और दहशत में माना जाता है कि सब इसके केंद्र यानि दिल्ली से संचालित होने की बात कहते हैं। यानि प्रदेश शासन का न के बराबर काबू। चिकित्सक महोदय से मिला तो चेहरा बेनूर, चिंता में घिरा और अवसाद ग्रस्त दिखा। कुरेदने पर जो सुना उससे दुख हुआ। वे इस्तीफा दे रहे हैं। कारण स्वास्थ्य विभाग में चापलूसी से चपरासी बाप बनता है। मंत्री जी की सगी रिश्तेदार महिलाएं विभाग में हैं और जिले में ही पदस्थ हैं। एक सेवानिवृत्त हो गईं हैं। सिवाय चपरासी की किसी की नहीं सुनतीं । तमाम असुविधाओं के साथ ग्रामीण इलाके में सेवा दे रहे चिकित्सक महोदय फालतू की जलालत- मलालत से आज़िज़ आ गए। जितने बार आवेदन दिया ट्रांसफर का, तकलीफ बतायी उतनी बार ही प्रताड़ना बढ़ती गयी। जब स्वाभिमान के आगे सहन नहीं हुआ तो इस्तीफा लिख लिया। और सौंपने का पूरा मन भी बना लिया। ठान लिया है कि इस्तीफा दे भी देंगे। एक वरिष्ठ पत्रकार से चर्चा की तो उन्होंने एक कम्पाउण्डर का किस्सा सुना दिया। बताया कि उसे भी इसी जिले में इसी तरह प्रताड़ित किया। बर्खास्त किया। सब जगह से जीता पर नौकरी नहीं चढ़ पाया। ऐसे अनेकों किस्से आपको संचालनालय के गलियारों में सुनने मिल जाएंगे।
अब सवाल यह है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शासन में चिकित्सकों की इस हालत का असर किस पर पड़ता है? प्रशासनिक स्तर पर योजनाओं पर बड़ी-बड़ी बातें और हकीकत एकदम उलट। क्या प्रदेश से सरकारी चिकित्सक एक दिन विलुप्त हो जाएंगे? क्या इस तरह सरकारी चिकित्सा सेवा के निजी हाथों में जाने की ज़मीन तैयार नहीं हो रही है? प्रदेश में सरकारी चिकित्सकों को टोटा नहीं है क्या? यदि हां, तो आप और आपका विभाग सकारात्मक माहौल बनाने में असफल क्यों है? वीआरएस लेने वाले सरकारी चिकित्सकों किस संख्या नियंत्रण में क्यों नहीं है? क्या चिकित्सा अधिकारियों व कर्मचारियों की हड़ताल या आंदोलन के बाद आप फिर उपवास रखेंगे?
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