दम्भित सत्ताधीश, भटका विपक्ष और चुनाव !
मध्यप्रदेश में चुनावी दंगल और सत्ता पर काबिज़ होने की होड़ इस तरह से हावी है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों के विज्ञापनों से एक दूसरे की छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। चुनावी रणभेरियों में आम जन से लूट मचाने में कौन ज्यादा सफल रहा का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है।
जहां एक ओर शिवराज माटीपुत्र किसान के हितैषी होने का दम्भ भरते हैं वहीँ प्रदेश कांग्रेस आदिवासियों के हित की बात कहती है। शिवराज जहां अपने ही दल के एक वरिष्ठ नेता द्वारा जहां उन्हें ''घोषणावीर" का तमगा दिया गया तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश किसान संघ द्वारा अपने घर में ही घेर दिए गए। दिसंबर 2010 में किसान संघ अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा ने लगभग 4000 ट्रेक्टर-ट्रॉलियों के साथ विराट घेराव-प्रदर्शन किया था। किसान शिवराज के सात साल के शासन में किये वादे पूरे ना होने पर क्रोधित हो पूरे प्रदेश से राजधानी को बंधक बनाने चले आये थे।इसमें एक किसान लाठीचार्ज व गोलीबारी में काल के गाल में समा गया।
वहीँ कांग्रेस की स्तिथि देखें तो पाएंगे कि शिवराज से पहले राज कर रहे दिग्विजय सिंह को कर्मचारियों के क्रोध का सामना करना पड़ा था। दैनिक वेतन भोगियों की नौकरी लीलने के साथ घाटे के नाम पर निगम-मंडल बंद करने से उपजे रोष ने ना सिर्फ दिग्विजय सिंह को कुर्सी से उतार दिया बल्कि दस वर्ष तक पद मोह को त्यागने की शपथ लेने पर भी मजबूर कर दिया था। ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर न पड़ने देते हुए मोर्चा सम्भाला स्व. जमुना देवी ने। "बुआ" सम्बोधन से प्रसिद्ध रहीं जमुना देवी ने जमकर सरकार के कान उमेठे। डम्फर काण्ड को लेकर जिस तरह से उन्होंने मोर्चा लिया वह किसी से छुपा नहीं था। प्रदेश की पूर्व उप-मुख्यमंत्री, लोक सभा, राज्यसभा सदस्या रहीं बुआजी कि छवि महिलाओं, दमित-शोषित व आदिवासियों की आवाज़ उठाने वाले की रही। प्रदेश की ज़मीनी व कद्दावर नेता रही जमुना देवी के सितम्बर 2010 में देहावसान से भाजपा को फायदा पहुंचा। प्रदेश स्तर पर आंतरिक रूप से गुटों व धड़ों में बंटी कांग्रेस की मुद्दों पर पकड़ ढीली पड़ गयी। राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर क्षतिग्रस्त होती कांग्रेस की छवि प्रदेश में भी कहीं न कहीं अपना प्रभाव दिखा गयी।
अक्सर देखा जाता है कि विकास की कहानी ज़मीन और सरकारी पन्नों पर अलग ही बयाँ होती है। जहाँ आदिवासी आज भी दयनीय स्तिथि में है तो वहीँ किसान भी खुश नहीं हैं।एक तरफ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया आदिवासियों की दमदार पैरवी करने में असफल रहे तो दूसरी ओर अपने दल में भी कोई खम्ब नहीं ठोक पाये। आंतरिक रूप से विखंडित प्रदेश कांग्रेस ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई है। दो विधानसभा कार्यकाल में शिवराज व उनके विधायकों ने कई आरोपों का सामना किया। कमजोर पड़े विपक्ष ने शिवराज को कई दफा अभयदान प्राप्त होने दिया।
प्रदेश में चुनावी घमासान भले ही बागियों और भितरघातियों ने रोचक बना दिया हो, पर जनता के असल मुद्दे कब सुलझेंगे यह प्रश्न अब भी गम्भीरता लिए हर मोड़ पर खड़ा है। दावे और वादे से इतर आम जन की एक आस और गुहार भी है कि उसके दिन बदलें। आमजन चाहता है कि हित की बात करके सरकार बनाने वाले वास्तव में कुछ सुखद बदलाव भी कर दिखाए, चाहे सरकार किसी की भी आये।
मध्यप्रदेश में चुनावी दंगल और सत्ता पर काबिज़ होने की होड़ इस तरह से हावी है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों के विज्ञापनों से एक दूसरे की छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। चुनावी रणभेरियों में आम जन से लूट मचाने में कौन ज्यादा सफल रहा का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है।
जहां एक ओर शिवराज माटीपुत्र किसान के हितैषी होने का दम्भ भरते हैं वहीँ प्रदेश कांग्रेस आदिवासियों के हित की बात कहती है। शिवराज जहां अपने ही दल के एक वरिष्ठ नेता द्वारा जहां उन्हें ''घोषणावीर" का तमगा दिया गया तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश किसान संघ द्वारा अपने घर में ही घेर दिए गए। दिसंबर 2010 में किसान संघ अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा ने लगभग 4000 ट्रेक्टर-ट्रॉलियों के साथ विराट घेराव-प्रदर्शन किया था। किसान शिवराज के सात साल के शासन में किये वादे पूरे ना होने पर क्रोधित हो पूरे प्रदेश से राजधानी को बंधक बनाने चले आये थे।इसमें एक किसान लाठीचार्ज व गोलीबारी में काल के गाल में समा गया।
वहीँ कांग्रेस की स्तिथि देखें तो पाएंगे कि शिवराज से पहले राज कर रहे दिग्विजय सिंह को कर्मचारियों के क्रोध का सामना करना पड़ा था। दैनिक वेतन भोगियों की नौकरी लीलने के साथ घाटे के नाम पर निगम-मंडल बंद करने से उपजे रोष ने ना सिर्फ दिग्विजय सिंह को कुर्सी से उतार दिया बल्कि दस वर्ष तक पद मोह को त्यागने की शपथ लेने पर भी मजबूर कर दिया था। ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर न पड़ने देते हुए मोर्चा सम्भाला स्व. जमुना देवी ने। "बुआ" सम्बोधन से प्रसिद्ध रहीं जमुना देवी ने जमकर सरकार के कान उमेठे। डम्फर काण्ड को लेकर जिस तरह से उन्होंने मोर्चा लिया वह किसी से छुपा नहीं था। प्रदेश की पूर्व उप-मुख्यमंत्री, लोक सभा, राज्यसभा सदस्या रहीं बुआजी कि छवि महिलाओं, दमित-शोषित व आदिवासियों की आवाज़ उठाने वाले की रही। प्रदेश की ज़मीनी व कद्दावर नेता रही जमुना देवी के सितम्बर 2010 में देहावसान से भाजपा को फायदा पहुंचा। प्रदेश स्तर पर आंतरिक रूप से गुटों व धड़ों में बंटी कांग्रेस की मुद्दों पर पकड़ ढीली पड़ गयी। राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर क्षतिग्रस्त होती कांग्रेस की छवि प्रदेश में भी कहीं न कहीं अपना प्रभाव दिखा गयी।
अक्सर देखा जाता है कि विकास की कहानी ज़मीन और सरकारी पन्नों पर अलग ही बयाँ होती है। जहाँ आदिवासी आज भी दयनीय स्तिथि में है तो वहीँ किसान भी खुश नहीं हैं।एक तरफ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया आदिवासियों की दमदार पैरवी करने में असफल रहे तो दूसरी ओर अपने दल में भी कोई खम्ब नहीं ठोक पाये। आंतरिक रूप से विखंडित प्रदेश कांग्रेस ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई है। दो विधानसभा कार्यकाल में शिवराज व उनके विधायकों ने कई आरोपों का सामना किया। कमजोर पड़े विपक्ष ने शिवराज को कई दफा अभयदान प्राप्त होने दिया।
प्रदेश में चुनावी घमासान भले ही बागियों और भितरघातियों ने रोचक बना दिया हो, पर जनता के असल मुद्दे कब सुलझेंगे यह प्रश्न अब भी गम्भीरता लिए हर मोड़ पर खड़ा है। दावे और वादे से इतर आम जन की एक आस और गुहार भी है कि उसके दिन बदलें। आमजन चाहता है कि हित की बात करके सरकार बनाने वाले वास्तव में कुछ सुखद बदलाव भी कर दिखाए, चाहे सरकार किसी की भी आये।
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