
जिस राह का मैं पथिक
विचलित -भ्रमित मैं नहीं तनिक
अगर-मगर की बहुत निकली डगर
न क़दमों में कम्पन ,मैं चला निर्भीक
थामा है दामन सच का
थामा है दामन सच का
प्रहारों से मैं न बिचका
यज्ञ है यह उन आह्वानो का
ऋणी रहा हूँ बचपन से जिनका
आहुति कुंड की लपटों से मेरे
लालिमा लिया नभ है घेरे
शंखनाद बलिदान का वहां हैं फूंका
माया -लोभ के जहां डले हैं डेरे
शिशु से शिथिल अवस्था तक की दूरी
समय लगे बिन देर होती है पूरी
कहत करत चल बसे सयाने
सतकर्म गति बिन अधूरी जीवन धुरी
समय लगे बिन देर होती है पूरी
कहत करत चल बसे सयाने
सतकर्म गति बिन अधूरी जीवन धुरी
सत्कर्म ही वह धूरी है जिसके बल पर चलने से आत्मा न केवल प्रसन्न होती है बल्कि उसके विस्तार के लिए प्रोत्साहित भी करती है|
जवाब देंहटाएंशानदार अच्छी रचना के लिए बधाई