गुरुवार, 15 जून 2017

भाजपा का उपवास, कांग्रेस का सत्याग्रह और रावण का चयन







(संदर्भ: मप्र में किसान आंदोलन व हत्याकांड )

     यदि भीड़तंत्र को पैमाना माना जाए तो बुधवार का दिन कांग्रेस के लिए भाजपा के “उपवास” उपक्रम की तुलना में सफल दिखाई दिया। प्रदेश में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी व  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के दो करोड़ से ऊपर के व्यय वाले  डेढ़ दिवसीय उपवास आयोजन में तुलनात्मक रूप से भीड़ कम होना एक बड़ा इशारा है।

   आगामी वर्ष में चुनाव के चलते प्रदेश की राजनीति में हलचल शुरू हो गयी है। इसी तारतम्यता में भीड़ आधारित भव्य आयोजनों का  दिलचस्प पहलू यह है कि दोनों आयोजन विपरीत दिशा में स्थित दशहरा मैदानों में हुए। कर्ज और समस्याओं से घिरे सात माटी पुत्रों की हत्या और किसानों की समस्या के प्लॉट पर यह राजनीति गर्मायी हुई है। एक तरफ किसान पुत्र की छवि बनाये हुए सीएम शिवराज किसान आंदोलन और इस दौरान पुलिस फायरिंग में हुई हत्याओं के दोष कांग्रेस और अराजक तत्वों पर मढ़ रहे हैं, आयोग गठित कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस पूरा ठीकरा भाजपा शाषित केंद्र और प्रदेश सरकार पर फोड़ रही। यानि किसान को केंद्र में लेकर समस्त राग हर सुर में आलापे जा रहे हैं।यह तय है कि नारों और आरोपों के आरोह पर भीड़ रूपी श्रोता का मंत्र मुग्ध होना वोट के ग्राफ को बढ़ाएगा या गिरायेगा।
   दोनों आयोजनों में एक रोचक पहलू खेमेबाजी का भी  सामने आया है। भाजपा में जहां सभी बड़े चेहरों में एकजुटता दिखाई देती है वह धरातल पर स्तिथि स्पष्ट कर जाती है। मंच पर सब दिखते हैं अपने रिपोर्ट कार्ड और नम्बरों के लिए पर उनके लापता समर्थक सारी स्तिथि बयां कर जाते हैं। पार्टी के बड़े कद के नेता दबी जुबान से सीएम चौहान का विभागीय योजनाओं के कार्यक्रम में माइलेज लेने से नाराजगी उपजने की बात कहते हैं। इसका परिणाम साथ दिखने के बावजूद साथ नहीं होने के रूप में सामने आ रहा है। यही सीएम के उपवास कार्यक्रम ने नज़र आया। वहीं कांग्रेस में अपने-अपने खेमे के साथ झंडा बुलंद करने में अलग दिखने वाले प्रमुख नेताओं से भरा मंच उनकी एकजुटता भी दिखा गया। इस एकजुटता का प्रमाण वहां आकर्षित हुई, बुलवाई गयी या शक्ति प्रदर्शन के लिए हर खेमे के लिए आई भीड़ ने दिया।
  आगामी वर्ष 2018 के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए दोनों दलों ने शहर के महत्वपूर्ण दशहरा मैदानों से मोर्चे खोलेने का अनुष्ठान सम्पन्न कर लिया है। यह वही दशहरा मैदान हैं जहां साल में एक बार रावण जलता है तो जनता अच्छाई पर बुराई की जीत का जश्न मानती है।      
    फिलहाल दोनों ओर से मैं अच्छा- तू बुरा का द्वंद शुरू है। इस द्वंद में राम रूपी जनता अपने वोट रूपी अस्त्र से रावण और राम का चयन करेगी। चलते-चलते एक सत्य यह भी की रावण दहन पश्चात लगने वाले मेले में उत्साह तो होता है पर जेबकट और ठग अपना खेल दिखा ही देते हैं।
(चित्र: सीएम शिवराज के उपवास व कांग्रेस के सत्याग्रह के आयोजन स्थल के मंच व मौजूद समर्थक)


रविवार, 11 जून 2017

सरकारी चिकित्सक क्या विलुप्त हो जाएंगे?


(संदर्भ: जिले के चिकित्सक की प्रताड़ना कथा)
     कल एक चिकित्सक से बात हुई। वे मध्यप्रदेश शासन के अधीन लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ हैं। एमपीपीएससी परीक्षा द्वारा इनका चयन हुआ था। अब वे इस्तीफा दे रहें हैं।
    चिकित्सक महोदय को पदस्थापना राजधानी से सटे जिले में मिली। यह जिला पूरी तरह एक वरिष्ठ नेता और  विधायक (कैबिनेट मिनिस्टर) के इतने प्रभाव और दहशत में माना जाता है कि सब इसके केंद्र यानि दिल्ली से संचालित होने की बात कहते हैं। यानि प्रदेश शासन का न के बराबर काबू। चिकित्सक महोदय से मिला तो चेहरा बेनूर, चिंता में घिरा और अवसाद ग्रस्त दिखा। कुरेदने पर जो सुना उससे दुख हुआ। वे इस्तीफा दे रहे हैं। कारण स्वास्थ्य विभाग में चापलूसी से चपरासी बाप बनता है। मंत्री जी की सगी रिश्तेदार महिलाएं विभाग में हैं और जिले में ही पदस्थ हैं। एक सेवानिवृत्त हो गईं हैं। सिवाय चपरासी की किसी की नहीं सुनतीं । तमाम असुविधाओं के साथ ग्रामीण इलाके में सेवा दे रहे चिकित्सक महोदय फालतू की जलालत- मलालत से आज़िज़ आ गए। जितने बार आवेदन दिया ट्रांसफर का, तकलीफ बतायी उतनी बार ही प्रताड़ना बढ़ती गयी। जब स्वाभिमान के आगे सहन नहीं हुआ तो इस्तीफा लिख लिया। और सौंपने का पूरा मन भी बना लिया। ठान लिया है कि इस्तीफा दे भी देंगे। एक वरिष्ठ पत्रकार से चर्चा की तो उन्होंने एक कम्पाउण्डर का किस्सा सुना दिया। बताया कि उसे भी इसी जिले में इसी तरह प्रताड़ित किया। बर्खास्त किया। सब जगह से जीता पर नौकरी नहीं चढ़ पाया। ऐसे अनेकों किस्से आपको संचालनालय के गलियारों में सुनने मिल जाएंगे। 
   अब सवाल यह है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शासन में चिकित्सकों की इस हालत का असर किस पर पड़ता है? प्रशासनिक स्तर पर योजनाओं पर बड़ी-बड़ी बातें और हकीकत एकदम उलट। क्या प्रदेश से सरकारी चिकित्सक एक दिन विलुप्त हो जाएंगे? क्या इस तरह सरकारी चिकित्सा सेवा के निजी हाथों में जाने की ज़मीन तैयार नहीं हो रही है? प्रदेश में सरकारी चिकित्सकों को टोटा नहीं है क्या? यदि हां, तो आप और आपका विभाग सकारात्मक माहौल बनाने में असफल क्यों है? वीआरएस लेने वाले सरकारी चिकित्सकों किस संख्या नियंत्रण में क्यों नहीं है?  क्या चिकित्सा अधिकारियों व कर्मचारियों की हड़ताल या आंदोलन के बाद आप फिर उपवास रखेंगे?