मंगलवार, 30 मई 2017

विमुखीकरण....


                                                            (प्रसंग- हिंदी पत्रकारिता दिवस)

       कोई तो है जो नकार दिया जाता है। कोई तो है जिसकी आवाज़ कानों तक पहुंचती है, अन्तस् को झकझोरती है। कोई तो है जो आपके बीच मौजूद है और सब निहार रहा है, पुकार रहा है। शायद सचेत कर रहा है। कोई तो है जो असत्य, झूठे वादों, अधूरे सपनों, छल-कपट, हिंसा, द्वेष, क्षोभ, परनिंदा, कुंठा से भरे मृगमरीचिका समान अलौकिकता का एहसास कराती चकाचौंध से दूरी के लिए चेताता है। कोई तो है जो त्याग देता है ऐसी चकाचौंध और एक अंधियारे पक्ष को अपनी पीठ पर पाल लेता है। कोई तो है जिसकी अंतरात्मा अपेक्षा की पीड़ा से तिल-तिल मरती है और शुभ कामनाओं से भरे रहने के चलते जीवित रहती है। वो कौन है जो कहता है आगे बढ़, पर संभलकर, गति पर नियंत्रण सहित।
     उसकी पीठ पर गिद्धों की चोंच के निशान हैं। वह विमुखीकरण का मारा है। वही विमुखीकरण जो समाज के पीठ दिखाने से उपजा। अब गिद्ध ही उसके स्वामी हैं और वह उसका बंधुआ। वह नोचा ज्यादा जाता है। वह कुपोषित हो चुका है। वह मरेगा नहीं क्योंकि गिद्ध उसे जिंदा रहने लायक निवाला देते हैं।वह निवाला स्वीकारता है। वह मरना भी नहीं चाहता ताकि वो कहीं से आवाज़ दे सके तुम्हें। गिद्धों के खिलाफ। गिद्धों को भी निवाला देते हुए।
प्रसंगवश: सनद रहे कि जिस 'उद्दंत मार्तण्ड' के प्रकाशन के चलते हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है, वह मात्र डेढ़ साल में ही बंद हो गया। पंडित श्री जुगल किशोर शुक्ल जी ने इसका खर्च व्यय करने की असमर्थता के चलते इसके प्रकाशन को विराम दे दिया था। तब शायद सरकार ज्यादा अडिग और पत्रकार ज्यादा निडर व स्वाभिमानी थे
हिंदी पत्रकारिता दिवस की अशेष व विशेष शुभकामनाएं।