जनराग
मंगलवार, 5 जुलाई 2011
कशमकश
कशमकश में ना जाने कितने कश उड़े,
चार कदम बहककर घर को ही मुड़े।
चार चिरागों ने दिखाई थी लौटते वक्त रोशनी,
चली जो आंधी, वही आशियां खाक होने तक उजड़े।।
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