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सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

न्याय के मंदिर में हमलावर युवा

तीस वर्षीय उत्सव शर्मा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से फाइन आर्ट्स में अव्वल दर्जे से उत्तीर्ण व एन आई ऍफ़ डी अहमदाबाद में अध्यनरत वह युवा है जिसकी पहचान एक हमलावर की बन गयी है।उत्सव फिर से ब्रेकिंग न्यूज़ बना ।इस बार उसने गंडासे से तलवार पर हमला करा ।इससे पहले उत्सव ने आई पी एस राठौर पर भी हमला किया था । विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि उत्सव के कोप के भाजन किशोरियों के प्रति अपराध के आरोपों के कटघरे में है।
आज का युवा अपना मन टटोले और खुद से यह सवाल पूछे कि क्या उत्सव ने वही किया जो हमारे मन में प्रथम विचार आता है रुचिका और आरुषि के आरोपियों के प्रति ? क्या उत्सव वास्तव में मनोरोगी है? यदि हां तो जिम्मेदार कौन है उत्सव के मनोरोगी होने का ? क्योंकि उत्सव आदतन अपराधी नहीं है और न ही वह राह चलते को मारता है । गौरतलब है की उत्सव के माता- पिता स्वयं अति पवित्र धर्म 'शिक्षा' के क्षेत्र में है । वे दोनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर है। पिताजी विश्वविद्यालय में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर है और माताजी मनोचिकित्सक व प्रोफेसर दोनों । यदि संस्कारो और शिक्षा की बात की जाए तो उत्सव का पालन , पोषण व शिक्षण कही ज्यादा बौद्धिक माहौल में हुआ है ।बेशक उत्सव का कदम दुस्साहस की श्रेणी में आता हो पर सच यह भी है अभी कई उत्सव सामने आना बाकी है। बुज़ुर्ग एवं भ्रष्ट राजनेताओं के हाथों सत्ता हो और लालफीताशाही चरम पर अपने ज्ञान के बल पर देश को चरमरा रही हो तो युवा प्रतिशोध व रोष कैसे दर्शायेगा ? यदि उत्सव ने गलत किया है तो हमें (युवाओं को) देश के दोबारा गुलाम होने का इंतज़ार करना होगा ताकि हम भी क्रांति की चिंगारी की गर्माहट सबको महसूस करा सके । किन्तु यह अब मुमकिन नहीं क्योंकि अब हम गुलाम ढिंढोरा पीट कर नहीं बनाये जायेंगे । विश्वगुरु भारत मानसिक गुलाम बनाया जा रहा है । संस्कृति पर हमले हो रहे । पाश्चात्य संस्कृति हावी हो चुकी है। लोकतंत्र के तीनों खम्बो को कोसना कथित चौथे खम्बे के लिए ब्रह्मपाप समान हो चूका है , क्योंकि भ्रष्टाचार रुपी रक्त तीनों खम्बो से निकल चौथे की रगों में प्रवाहित हो चला है। इन सब से तिलमिलाता युवा अपना 'उत्सव' तलाश ही लेता है। रुचिका व आरुषि के लिए शान्ति से प्रदर्शन हुए ,किसके कान में जू रेंगी ? उत्सव ने थोडा चोंगा (मीडिया) का उपयोग किया सब हिल गए। कई जगह उल्लेख हो चूका है इस पंक्ति का फिर भी मुझे इसे उद्धृत करने में सहूलियत ही महसूस होगी। पंक्ति कुछ इस प्रकार है ... ''भगत सिंह की फांसी पर गाँधी कुछ नहीं कहते..कहते तो भगत भारत आज़ाद कर ले जाते..." अब हमे ही सोचना होगा की आज का युवा भगत बने या गोडसे।