बुधवार, 20 नवंबर 2013

                               दम्भित सत्ताधीश, भटका विपक्ष और चुनाव !
                             

मध्यप्रदेश में चुनावी दंगल और सत्ता पर काबिज़ होने की होड़ इस तरह से हावी है कि व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोपों के विज्ञापनों से एक दूसरे की छवि धूमिल करने की कोशिश की जा रही है। चुनावी रणभेरियों में आम जन से लूट मचाने में कौन ज्यादा सफल रहा का शोर ज्यादा सुनाई दे रहा है।
 जहां एक  ओर शिवराज माटीपुत्र किसान के हितैषी होने का दम्भ भरते हैं वहीँ प्रदेश कांग्रेस आदिवासियों के हित की बात कहती है। शिवराज जहां अपने ही दल के एक वरिष्ठ नेता द्वारा जहां उन्हें ''घोषणावीर" का तमगा दिया गया तो दूसरी ओर मध्य प्रदेश किसान संघ द्वारा अपने घर में ही घेर दिए गए। दिसंबर 2010 में किसान संघ अध्यक्ष शिव कुमार शर्मा ने लगभग 4000 ट्रेक्टर-ट्रॉलियों के साथ विराट घेराव-प्रदर्शन किया था।  किसान शिवराज के सात साल के शासन में किये वादे पूरे ना होने पर क्रोधित हो पूरे प्रदेश से राजधानी को बंधक बनाने चले आये थे।इसमें  एक किसान लाठीचार्ज व गोलीबारी में काल के गाल में समा गया।
 वहीँ कांग्रेस की स्तिथि देखें तो पाएंगे कि शिवराज से पहले राज कर रहे दिग्विजय सिंह को कर्मचारियों के क्रोध का सामना करना पड़ा था। दैनिक वेतन भोगियों की नौकरी लीलने के साथ घाटे के नाम पर निगम-मंडल बंद करने से उपजे रोष ने ना सिर्फ दिग्विजय सिंह को कुर्सी से उतार दिया बल्कि दस वर्ष तक पद मोह को त्यागने की  शपथ लेने पर भी मजबूर कर दिया था।  ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस को कमजोर न पड़ने देते हुए मोर्चा सम्भाला स्व. जमुना देवी ने।  "बुआ" सम्बोधन से प्रसिद्ध रहीं जमुना देवी ने जमकर सरकार के कान उमेठे। डम्फर काण्ड को लेकर जिस तरह से उन्होंने मोर्चा लिया वह किसी से छुपा नहीं था। प्रदेश की पूर्व उप-मुख्यमंत्री, लोक सभा, राज्यसभा  सदस्या रहीं बुआजी कि छवि  महिलाओं, दमित-शोषित व आदिवासियों की आवाज़ उठाने वाले की रही। प्रदेश की ज़मीनी व कद्दावर नेता रही जमुना देवी के सितम्बर 2010 में देहावसान से भाजपा को फायदा पहुंचा। प्रदेश स्तर पर आंतरिक रूप से गुटों व धड़ों में बंटी कांग्रेस की मुद्दों पर पकड़ ढीली पड़ गयी।  राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर क्षतिग्रस्त होती कांग्रेस की छवि प्रदेश में भी कहीं न कहीं अपना प्रभाव दिखा गयी।
अक्सर देखा जाता है कि विकास की कहानी ज़मीन और सरकारी पन्नों पर अलग ही बयाँ होती है। जहाँ आदिवासी आज भी दयनीय स्तिथि में है तो वहीँ किसान भी खुश नहीं हैं।एक तरफ कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया आदिवासियों की दमदार पैरवी करने में असफल रहे तो दूसरी ओर अपने दल में भी कोई खम्ब नहीं ठोक पाये।  आंतरिक रूप से विखंडित प्रदेश कांग्रेस ने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई है।  दो विधानसभा कार्यकाल में शिवराज व उनके विधायकों ने कई आरोपों का सामना किया।  कमजोर पड़े विपक्ष ने शिवराज को कई दफा अभयदान प्राप्त होने दिया।
प्रदेश में चुनावी घमासान भले ही बागियों और भितरघातियों ने रोचक बना दिया हो, पर जनता के असल मुद्दे कब सुलझेंगे यह प्रश्न अब भी गम्भीरता लिए हर मोड़ पर खड़ा है।  दावे और वादे से इतर आम जन की एक आस और गुहार भी है कि उसके दिन बदलें।  आमजन चाहता है कि हित की  बात करके सरकार बनाने वाले वास्तव में कुछ सुखद बदलाव भी कर दिखाए, चाहे सरकार किसी की भी आये।


शनिवार, 12 जनवरी 2013

"बड़ी अम्मा",शेरों की शिकारी और एक फूल की दास्ताँ

                                                                      -RAHUL CHOUKSEY
दो पड़ोसी थे। दोनों के अधिकार क्षेत्र का निर्धारण बाड़ से होता था। अमूमन दोनों के घर के अन्दर होने वाले झगड़े की गूँज एक-दूसरे को सुनाई देती थी।बर्तन भी गिरता तो खनक से पहचान जाते कि दूसरे के यहाँ क्या हुआ। कारण कि कभी दोनों के चूल्हे एक थे।एक घर बड़ा था,तो दूसरा छोटा।दोनों की रियाया के रहनुमा एक सरीखे 
   बड़े घर की मुखिया ''बड़ी अम्मा'' को शान्ति पसंद न थी, पर वे खुद और उनके खिदमतगार बड़े शांत रहते थे। कहते है ''बड़ी अम्मा '' के पास बड़ी रियाया थी,पर उस रियाया के लिए रियायत बिलकुल नहीं। लगान से त्रस्त पर आश्वासनों से जीवटता बरकरार रखती रियाया विधवा "बड़ी अम्मा" के प्रति रूढ़िगत संस्कारों के चलते आस्था बनाए रखती थी। "बड़ी अम्मा" का प्रवेश इस घर में पिछले रास्ते से हुआ था। कहते है "बड़ी अम्मा" ससुराल से चोरी छिपे माल ढोकर अपने मायके में रख आती थी। "बड़ी अम्मा के बच्चे" अपने ननिहाल से बड़ा लगाव रखते थे। वे भी इस माल ढुलाई में अपनी माँ की भरपूर मदद करते। जब भी रियाया जवाब मांगती,"वे" "बड़ी अम्मा के आँचल" में छिप जाते। "लाचार रियाया" जब भी रिरयाती-गरजती-आँखें तरेरती तब "बड़ी अम्मा" के खिदमतगार नाना प्रकार के स्वांग रचते और थाली से रोटी,चूल्हे से लकड़ी और तन से कपड़े छीन लेते। रियाया मन मसोस कर नंगे पैर पथरीले रास्ते वापिस लौट जाती। जनता "मुनादी करने वालों" को बहुत विश्वास और इज्ज़त की नज़रों से देखती थी।विश्वास और हमदर्दी की नज़रों से इसलिए इन मुनादी पीटने वालों के पूर्वजों के शोर से पनपे जोर ने घर पर राज करने के बाद "दो टुकड़े" करने वालों को खदेड़ दिया था। रियाया को यकीन के साथ संदेह है कि ये मुनादी वालों  को  "बड़ी अम्मा" ने टुकड़े-टुकड़े कर टुकड़ों में खरीद लिया है। रियाया कहती है कि "मुए मुनादी वाले'' कान में शोर किए रहते है।
   एक रोज ''एक फूल सी बिटिया'' छाँव न मिल पाने के कारण "ताप" से मुरझा गयी।"क्षरण" से "पतित" हो वह जब अलविदा हो रही थी, एकाएक ''महक'' उठी। उसकी निर्जीव किन्तु तेजस्वी काया ऐसी महकी कि जनता बेचैन हो उठी।"महक" से एकजुट हुई रियाया "छाँव की गुहार" ले अपनी फुलवारियों को रक्षा देने की मांग करने लगी।  "बड़ी अम्मा" और "खिदमतगार" अबकी बार मामले की गंभीरता भांप चुके थे।मुनादी वाले भी अब चोंगे उपयोग में लाने लगे थे। स्वाभाविक है आवाज़ ज़ोरदार हो चुकी थी,किन्तु गला अभी भी फाड़ना पड़ता था। बड़ी अम्मा और खिदमतगार आश्चर्यचकित थे कि जो कलियाँ 'गजरा' बना बंद कमरों में जबरन रौंदी जाती थी,उसको राह चलते कैसे कुचल दिया गया? खैर बड़ी अम्मा और खिदमतगारों की खैरियत इसी में थी के वे चार दीवारी के पीछे से शोर सुने। मुनादी से चोंगे वालों में तब्दील मुलाज़िमों को हुक्म जारी हुआ कि  बहुत हुई ऐश,अपनी मोटी चमड़ी ले भीड़ में उतरो। साथ ही निर्देश जारी हुए की वहीँ से चोंगे पर चिल्ला जानकारी देना। जनता को भी लगेगा की तुम्हारे अन्दर पूर्वजों की ईमानदारी,स्वाभिमान,आत्म-सम्मान जिंदा है।साथ ही चेतावनी भी जारी कर दी गयी कि ज्यादा जोर लगाकर भी न चिल्लाएं।बड़ी अम्मा ने बड़ी ही मासूमियत से इसका कारण बताया की वे सिर्फ गूंगे बनने का ढोंग करते है, बहरे होने का नहीं।अगले पल चोंगे चीख पड़े चीत्कार-पुकार-हाहाकार की सूचना के साथ। दिन में एक बार चोंगा भीड़ के बीचों से चिल्लाता तो चार बार बड़ी अम्मा के चौखट से।
पर इस बार छद्म आश्वासन भारी पड़ने और बढ़ने के साथ जनता का गुस्सा भी बढ़ते जा रहा था। बड़ी अम्मा और खिदमतगारों ने आपस में सलाह कर चोंगों पर एलान करवा दिया की निर्जीव किन्तु महक चुकी"फूल सी बिटिया" को जादूगर माली के पास दूसरी बगिया में भेज जीवन दिया जाएगा। शीघ्र ही सुबकती रियाया एक आस के साथ उस फूल सी बिटिया को आसमान में उछलता देख रही थी।शायद किसी दैवीय चमत्कार की आस में। जब जादुई माली ने हाथ खड़े कर दिए, तब वह  फिर आसमान में फिर उछाल दी गयी। 'एक सामूहिक मृत आस' के साथ वह अपनी जड़ों की मिट्टी में हमेशा के लिए पनाह लेने लौटी। पर बड़ी अम्मा और खिदमतगार उस फूल के जड़ों में समाहित होने के पश्चात् उत्पन्न होने वाले कम्पन व परिणाम को भांप चुके थे। लिहाजा मखमल की थाल पर जादुई माली के पाले से उछाली गयी निर्जीव फूल सी बिटिया को जकड़ा गया। जिस क्रूर ताप से वह मुरझाई थी लगभग उतनी ही तपिश से उसकी जड़ों को भी सेंका गया। इस दौरान चोंगे वाले जनता के क्रोध के राग को भावनाओं की स्वर लहरियां देते रहे।रियाया अब रिरिया नहीं रही थी, अपितु गरज रही थी। फिर बैठक हुई अम्मा और खिदमतगारों के बीच। सभी ने हमेशा की तरह ध्वनिमत दिया "ठीक है-ठीक है"।गोपनीय बैठक को नपे-तुले शब्दों के साथ खुले में मंचित किया गया।  चोंगे चीखे तो जनता फिर कराह उठी। अभी आत्मा पर पड़ी चोट का दर्द मिटा भी न था कि  "महंगाई" का चाबुक फिर लहुलुहान कर गया। बड़ी अम्मा अब नुकीली छड़ी ले एक-एक कर वार करने लगी। कोल्हू के बैल सरीखा जनता का हाल हो चुका था। तभी एकाएक चोंगा फिर चहका।चिल्लाया की बाड़ पर उस पार नज़र गाड़े दो शेर मर गए है। दोनों में दहाड़ में जोर था। चोंगे वाले भागे बाड़ की तरफ। फिर लगभग मुनादी वाले अंदाज़ में कहा कि बाड़ पार के शिकारियों ने शिकार किया है।शेर जिस बाड़े में पले-बढ़े थे,वहां मातम पसर गया। चोंगे वाले फिर मातम की शेहनाई बजाने लगे। चूँकि शेर मरे थे तो मातम में व्यापत अदृश्य जोश रगों में महसूस हुआ। फूल सी बिटिया की बलि के बाद शेरों की शहादत।फ़र्क इतना की शिकारी इस दफ़ा सालों पहले जुदा हुआ हमसाया ही है। और फूल को तोड़ने-मरोड़ने-कुचलने वाले घर के ही बिगडैल।वही जहां एक तरफ घर में अंधी-बूढ़ी पर कठोर कही जाने वाली नानी इन कपूतों के कान मरोड़ने लगी, तो दूसरी तरफ लहूलुहान-फटेहाल जनता 'शेरों के शिकारियों' के 'शिकार' की बात करने लगी ।
    क्रूर विधवा "बड़ी अम्मा" ने अपने खिदमतगारों के साथ लहूलुहान-फटेहाल जनता पर फिर गिद्ध-दृष्टी बना ली गयी।मांस नोचने की प्रक्रिया को शीघ्र अंजाम देने की तैयारी शुरू कर दी गयी। चोंगे से फिर ऐलान हुआ सालाना विधिवत डकैती का। रियाया फिर रोई , पर नए सितम पर। वो सितम जो घर को बांटने वाले,  ज़ुल्म ढाने वाले विरासत में दे गए थे।
   कहते है अम्मा के पास "जादुई कठपुतली" है।हु-ब-हु इंसान।भयंकर 'असरदार' व वफादार।ऐसा कहा जाता है कि ये कठपुतली सिर्फ बड़ी अम्मा से बात करती है। बाहर से आये मेहमानों का मनोरंजन भी करती है।एक रात अम्मा कठपुतली से बात कर रहीं थीं।कठपुतली से कह रही थी की देखा "मौन की शक्ति" को। देखा इन गुलामों का हश्र। बड़े चले थे हमारी ज़मीन सरकाने।अरे मूर्ख हैं ये सब। अगर घर के घर में आंगन उजाड़ने वाले मौजूद हो,तो क्या अपने शेरों का शिकार करने वाले मौजूद नहीं हो सकते। सुनो कठपुतली, ये जनता टोटके बहुत मानती है।अगर किसी का उसके पड़ोसी से झगड़ा लगाना हो तो काले कपड़े वाला सिर कटा पुतला और कटा निम्बू सिन्दूर लगा उसके आँगन पटक दो सुई चुभोकर।  हमने भी यही करा है। बस पुतला अपनों को बना अपने आँगन में ही पटक दिया। सुइयां आवाम को चुभन देते रहेंगी। और सुनो कठपुतली, जल्द ही प्रधान साहब आ रहे है इस मसले को सुलझाने तुम बस "ठीक है" कह देना। इसके बाद अम्मा अपने नन्हे-मुन्नों को माल बनाने-समेटने और पकड़े जाने पर चोंगों की मदद से,महंगाई की चाबुक से और मौकापरस्त हो रियाया का ध्यान हटाने का पाठ पढ़ाने लगी।
नोट: इस रचना का उद्देश्य अभिव्यक्ति की स्वंत्रता का उपयोग करना मात्र है।रचना पूर्णतः काल्पनिक है। किसी भी घटना अथवा जीवित एवं मृत पात्र से मेल मात्र एक संयोग माना जाएगा।