मंगलवार, 5 जुलाई 2011

कशमकश


कशमकश में ना जाने कितने कश उड़े,
चार कदम बहककर घर को ही मुड़े।
चार चिरागों ने दिखाई थी लौटते वक्त रोशनी,
चली जो आंधी, वही आशियां खाक होने तक उजड़े।।

एक चक्की के दो पाट



एक चक्की के है दो पाट,
अमीर पलंग तो गरीब है खाट ।
एक की सूखी चमड़ी तो एक के है ठाठ,
एक निकाले दमड़ी तो दूजा करे पैसों का पाठ।।

दाने-दाने को तरसे है एक,
पके-पकाए को दूसरा देता फेंक।
एक बहाता पसीना बिन देखे शीत और जेठ,
एक बहाता पसीना अंदर करने को पेट।।


दाना प्रेम का डालिए तो,
हटा तिरस्कार की भावना ।
दूरी धन की लकीर की पाटिए तो,
देख अद्भुत प्रेम-सागर की संभावना।।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011


इस शहर को फिर बसाने एक तरकीब चाहिए ,
इंसां को इंसां से फिर मिलाने एक तहज़ीब चाहिए।
उड़ चला है जो परिंदा नया आशियाना बसाने के लिए,
लौटा लाए वापिस उसे नीड़ की ओर,एक ऐसी डोर चाहिए।।