सोमवार, 19 सितंबर 2011

जिस राह का मैं पथिक


जिस राह का मैं पथिक
विचलित -भ्रमित मैं नहीं तनिक
अगर-मगर की बहुत निकली डगर
न क़दमों में कम्पन ,मैं चला निर्भीक

थामा है दामन सच का
प्रहारों से मैं न बिचका
यज्ञ है यह उन आह्वानो का
ऋणी रहा हूँ बचपन से जिनका

आहुति कुंड की लपटों से मेरे
लालिमा लिया नभ है घेरे
शंखनाद बलिदान का वहां हैं फूंका
माया -लोभ के जहां डले हैं डेरे

शिशु से शिथिल अवस्था तक की दूरी
समय लगे बिन देर होती है पूरी
कहत करत चल बसे सयाने
सतकर्म गति बिन अधूरी जीवन धुरी

1 टिप्पणी:

  1. सत्कर्म ही वह धूरी है जिसके बल पर चलने से आत्मा न केवल प्रसन्न होती है बल्कि उसके विस्तार के लिए प्रोत्साहित भी करती है|
    शानदार अच्छी रचना के लिए बधाई

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